अनजान था तो अच्छा था,
बेपरवाह हवा से लड़ता था,
क्या उम्र थी वो बिना किसी परवा के सोता था,
बस माँ के हाथ पर सर रख सपने संजोता था,
क्या मालूम था वो सपने कब क्या रूप लेंगे,
मुझे मेरी रूह से ही अलग कर देंगे !
वक्त बदलता गया, उम्र बढ़ती गई,
चंद रुपयों के लिए माँ से दूरी बढ़ती गई,
ये रुपय है साहब बस इनका ही मोल है,
जेब मै रखे है तो ही तुम्हारा तौल है !
मन करता है घर वापिस लौट जाऊ,
फिर माँ की गोद मै सर रख सो जाऊ,
कदम दो कदम चलते चलते नज़र फिर जेब पड़ी,
वही जेब मुझे फिर दफ्तर की ओर ले गई !
काश वो बचपन फिर लौट आये,
वो एक रुपये से मेरा जेब फिर भर जाये !

❤️ Touching 🎀
ReplyDeletethnx
DeleteCommendable,refreshing oneself of the childhood and past memories...
ReplyDeleteHeart touching
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